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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

एवं हि पञ्चकस्पन्दमात्रं जगदिति स्थितम् । चित्संविदत्र सर्वत्र विद्यते रघुनन्दन ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, बात ऐसी ही है, किन्तु इससे प्रक्रत में आया क्या ? इसपर कहते हैं। हे रघुनन्दन्‌, इस तरह यह संसार पंचतन्मात्रा का केवल स्पन्दनमात्र ही सिद्ध हे । ठीक है, तव तो अधिष्ठानचैतन्य सर्वत्र विद्यमान है, फिर घटादि चेतन क्यो नहीं है 2 इस शंका पर कहते है । ओर वह चितिसंवित्‌ ही यहाँ सर्वत्र विद्यमान है