Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
अनिशं निःश्वसद्रूपा रुषितेव भुजंगमी ।
संस्थितोर्ध्वीकृतमुखी स्पन्दनाहेतुतां गता ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें प्राणशक्ति वेगप्रदान करनेवाली कैसे है, यह कहते है ।
वही अपने मुख से प्राणवायु को ऊपर फेंकती है और अपान को नीचे खीचती है, इसलिए सदा
साँस खींचती हुई स्पन्दन में हेतु बनी हुई ऊपर की ओर मुँह करके करुद्ध सोपिन की नाई अवस्थित
रहती है