Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र विद्यमानापि देहेषु तरलायते ।
सर्वगोऽप्यातपः सौरो भित्यादौ वै विजृम्भते ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् में देशकृत परिच्छेद का अभाव होनेपर वह सर्वत्र भासित होने लगेगी, ऐसी आशंका करके
केवल उपाधि के कारण ही उसका उदय होता है, यह दृष्टान्तपूर्वक कहते हैं।
सर्वत्र विद्यमान रहता हुआ भी सूर्य का प्रकाश जैसे दीवार, दर्पण, जल आदि में विशषरूप से
अवभासित होता है वैसे ही सर्वत्र देहों में विद्यमान रहती हुई भी चितिसंवित् बुद्धि के चांचल्य से चंचल
अवभासित होती है