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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 90

अद्रासीर्वोँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग जिनका मोह शान्त हो चुका है, ऐसे महात्माओं को आकाशगमन आदि सिद्धियों की इच्छा नहीं होती तथा उनके शरीरो को व्याघ्र आदि हिंसक प्राणी घर्षित नहीं कर सकते, यह कथन |

63 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, महामुनि वीतहव्य की नाई अपने को तत्त्वज्ञानी बनाक…
  2. Verse 2हे राघव, इस ब्रह्माण्ड में तीस हजार वर्षो तक महामुनि वीतहव्य ने शोकवर्जित होकर सुखपूर्वक…
  3. Verse 3हे दीप्ति सम्पन्न महामते, जिस प्रकार अन्य महामति विदित वेद्य मननशील महात्मा निवास करते थे…
  4. Verse 4हे महाबाहो, यद्यपि आत्मा सर्वत्र व्यापक है, तथापि सुख-दुःखो की परम्परा से कभी भी वह पराभू…
  5. Verse 5हे प्रिय श्रीरामजी, आत्मस्वरूप को जान लेने वाले बहुत से महात्मा इस लोक में विचरण कर रहे ह…
  6. Verse 6हे श्रीरामजी, आप अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाइए, भीतर से सम्पूर्ण वस्तुओं का त्याग करने…
  7. Verse 7जैसे मयुरों के वश में सिंह नहीं हो जाते, वैसे ही आपके सदुश जीवन्मुक्त कोई भी महानुभाव हर्…
  8. Verse 8श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, इसी प्रसंग से मुझको यह एक संशय हुआ है, उसको आप मेच को शरत्‌काल…
  9. Verse 9हे आत्मज्ञानिया में श्रेष्ठ, जीवन्मुक्त शरीरवाले महात्माओं की आकाशगमन आदि शक्तिर्यौ यहाँ…
  10. Verse 10-शरीराणाम्‌* इस शब्द से प्रारब्ध होने पर वीतहव्य मुनि को अपने में जैसे विद्याधरत्व आदि का…
  11. Verse 11हे श्रीरामजी, जो चित्र विचित्र आकाशगमन आदि क्रियाकलाप दिखाई पड़ता है या प्रमाण से उपलब्ध…
  12. Verse 12तब मनुष्यों को योग की सिद्धि के द्वारा आकाशगमन आदि की प्राप्ति कैसे होती है इस पर कहते है…
  13. Verse 13तुच्छ होने के कारण आकाशगमन आदि सिद्धियाँ आत्मज्ञ विद्वान्‌ की अभिलाषा की विषय नहीं हो सकत…
  14. Verse 14संसार में जो कोई भी पदार्थ हैं, उन सबको आत्मज्ञ अविद्यामय ही मानते हैं, इसलिए अविद्या से…
  15. Verse 15जो योगाभ्यास आदि सैकड़ों परिश्रमो से अविद्या को भी आकाशगमन आदि सिद्धियों के द्वारा सुखसाध…
  16. Verse 16तब क्या तत्त्वज्ञ पुरुषो मे आकाशगमन आदि सिद्धियो को सम्पादन करने की सामर्थ्य है ही नहीं ?…
  17. Verse 17यहाँ धन आदि की अभिलाषाओं से वर्जित आत्मस्वरूपज्ञ पुरुष सबसे अतीत हो जाता है, वह अपने ही स…
  18. Verse 18आत्मज्ञ पुरुष को न तो कोई आकाशगमन से, न सिद्धि से, न तुच्छ भोगों से, न निग्रह अनुग्रह साम…
  19. Verse 19सदा सन्तुष्ट, प्रशान्तस्वरूप, रागवर्जित, वासनाशून्य तथा आकाश के सदृश निर्मल आकारवाला तत्त…
  20. Verse 20अपने जीवन ओर मरण की आसक्ति से वर्जित तत्त्वज्ञ पुरुष आकस्मिक प्राप्त हुए सुख और दुःख से अ…
  21. Verse 21जैसे समुद्र नदी-प्रवाह और नदी-प्रवाह से प्राप्त तृण, काष्ठ आदि के अपने भीतर प्रवेश से उपच…
  22. Verse 22तत्त्वज्ञ को यहाँ न तो कृत कर्म से (विधियुक्त अनुष्ठान से) ही प्रयोजन (पुण्य) है ओर न अकृ…
  23. Verse 23जो आत्मज्ञान से शून्य है, वह भी आकाशगमन आदि सिद्धियों को चाहता है और वह तथाविध सिद्धियों…
  24. Verse 24मणि, मन्त्र आदि युक्तियों से ही इस प्रकार की आकाशगमन आदि सिद्धि हो सकती है। तत्‌-तत्‌ शास…
  25. Verse 25जो देवता आदि की स्वतः आकाशगमन आदि सिद्धिर्हि, यह वस्तु स्वभाव ही है, अतएव उनमें वे उत्पत्…
  26. Verse 26चाहे सर्वज्ञ हो, चाहे बहुज्ञ हो, चाहे भगवान्‌ लक्ष्मीपति हों, चाहे उमापति हों, कोई भी निय…
  27. Verse 27हे श्रीरामजी, मणि आदि द्रव्य, काल, योगाभ्यास आदि क्रिया और मन्त्र प्रयोगो मे उक्त प्रकार…
  28. Verses 28–29जैसे विष को हरण करनेवाले ओषध आदि द्रव्यो की शक्ति अपने कार्य में समर्थ है, वैसे मणि, मन्त…
  29. Verse 30हे पापशून्य राघव, द्रव्य-काल-क्रियाक्रमस्वरूप आविद्यक विषयों से परे तथा अज्ञान को बाधित क…
  30. Verse 31जैसे क्रिया-फल स्वर्गादि में आत्मज्ञान का उपयोग नहीं है, वैसे ज्ञानफलमुक्ति मे द्रव्य, दे…
  31. Verse 32यदि आकाशमन आदि की किसी पुरूष को इच्छा होती है, तो वह उसकी सिद्धि का साधन पूर्णरूप से करते…
  32. Verse 33आत्मज्ञानी को इच्छा क्यो नहीं होती 2 इसे कहते हैं। हे निष्कलंक श्रीरामजी, जो आत्मा की प्र…
  33. Verse 34यद्यपि तत्त्ववेत्ता इच्छा से वर्जित है, तथापि वह यदि कौतुकवश यत्नानुष्ठान करे, तो उसे आका…
  34. Verse 35तब वीतहव्य को क्यो सिद्षियाँ नहीं हुई ? तो इस पर कहते है। आत्मज्ञान की इच्छावाले वीतहव्य…
  35. Verses 36–39इस प्रकार क्रिया, कर्म ओर द्रव्यरूपी युक्तियों के स्वभाव से उत्पन्न होनेवाली क्रम प्राप्त…
  36. Verse 40सिद्धि के विषय में या ज्ञान के विषय में अनुपरत प्रयत्न ही अवश्य फलवान्‌ है, इसका मुमुक्षु…
  37. Verse 41प्रथम प्रश्न का उत्तर देने के लिए महाराज वस्निष्ठजी भूमिका बोधते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने…
  38. Verse 42देहाभिमान-वासना से विनिर्मुक्त जीवन्मुक्त महात्मा की देह बाधित होने से अधिष्ठानभूत विशुद्…
  39. Verse 43उपपत्ति बतलाने के अनन्तर अब वक्तव्य के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। हे महाबाहो, अब आप यह सुनिय…
  40. Verse 44श्रीरामजी, चित्त जिस-जिस पदार्थ में जब-जब गिरता है यानी आसक्त होता है, तब-तब उस-उस पदार्थ…
  41. Verse 45जैसे जब मन शत्रु को देख लेता है, तब वह उस शत्रु के द्वेष के प्रतिबिम्ब से युक्त-सा होकर द…
  42. Verse 46इसीलिए यदि एक राग-द्वेष से शून्य रहता है, तो दूसरे में भी राग-द्रेष आदि अनुभूत नहीं होते,…
  43. Verse 47इसी प्रकार अचेतन भोज्य आदि पदार्थो के विषय में भी प्रीति, अप्रीति ओर उदासीनता ये सब उनमें…
  44. Verse 48वैसा मन भले ही हो, उससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते हैं। हे भद्र जो हिंसक जन्तुओं का…
  45. Verse 49इस विषय में पतंजलि मुनि ने हिसा प्रतिष्ठा का उपक्रम कर कहा है : (तत्संनिधौ वैरत्यागः” (अह…
  46. Verse 50योगी के शरीर के समीप से हिंसक प्राणी जब अन्यत्र चला जाता है, तो वहाँ जाकर द्वेष आदि से भर…
  47. Verse 51हे श्रीरामजी, इन्हीं दो कारणों से हिंसक मृग, बाघ, सिंह, कीट ओर सर्पोने भूगर्भ में प्रकाशि…
  48. Verse 52"कथं क्लिन्ना न भूतले“ (वीतहव्य की देह पृथ्वी में सड क्यो नहीं गई) इसका उत्तर देते हैं। क…
  49. Verse 53तव पुर्यष्टकं में (सूक्ष्म शरीरो मे) ही वह क्यो उपलब्ध होती है ? इस पर कहते हैँ । जैसे जल…
  50. Verse 54हे राघव, उस वीतहव्य-सम्बन्धी पुर्यष्टक ने तत्त्वज्ञान ओर तदनुकूल समाधि से अविषम स्वभाव को…
  51. Verse 55हे श्रीरामजी, इस विषय में मुझसे आप दूसरी भी युक्ति सुनिए | वह यह है कि स्पन्दन ही नाश में…
  52. Verse 56प्राणन -वृत्ति ही प्राण-वायुओं का स्पन्द है । हे राघव, चूँकि वीतहव्य की देह में धारणा द्व…
  53. Verse 57जिस महामति के हाथ, पैर तथा प्राण आदि से युक्त शरीर में चित्तजनित अथवा वातजनित स्पन्दन नही…
  54. Verse 58हे तत्त्वज्ञ-शिरोमणे, हाथ आदि बाह्य और प्राण आदि आन्तर अवयवों से युक्त शरीर में स्पन्दन-…
  55. Verse 59इसी तरह चित्तजनित और वातजनित देह स्पन्दन के शान्त हो जाने पर त्वचा आदि धातुएँ अपने चंचल स…
  56. Verse 60इसीलिए प्राणस्पन्द के शान्त हो जाने पर काष्ठ के सदृश योगियों के शरीरों में दृढ़ स्थिति और…
  57. Verse 61इस युक्ति से हजारों बरसों तक योगियों के शरीर इस लोक में मेघों की नाई न तो क्लिन्न (गीले)…
  58. Verse 62अन्तिम प्रश्न का अनुवादपूर्वक उत्तर देते हैं। हे श्रीरामजी, अब आप यह सुनिये कि जिन उपायों…
  59. Verse 63हे भद्र, जो विषयअभिलाषाओं से वर्जित, अज्ञानग्रन्थि से निर्मुक्त तथा विदित वेद्य महामति मह…
  60. Verse 64अब योगियों की स्वतन्त्रता का ही उपपादन करते हैं। हे श्रीरामजी, दैव (पूर्व के अनुष्ठित कर्…
  61. Verses 65–66हे प्रीतिपात्र श्रीरामजी, इसलिए तत्त्वज्ञो का अन्तःकरण काकतालीय की नाई अकस्मात्‌ जिस क्षण…
  62. Verse 67काकतालीय न्याय से वीतहव्य की संवित्‌ ने उस समय जीने की भावना की ओर उसी को तत्काल स्थिर कर…
  63. Verse 68उक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते है । श्रीरामजी, समस्त वासनाओं से विनिर्मुक्त तथा…