Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 40
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
सिद्धि के विषय में या ज्ञान के विषय में अनुपरत प्रयत्न ही अवश्य फलवान् है, इसका मुमुक्षु-
व्यवहार प्रकरण में सविस्तार वर्णन किया जा चुका है, इस आशय से कहते हैं ।
श्रीरामजी, जो-जो आकाशगमन आदि सिद्धिनामक फलो की पंक्तियाँ जिस पुरुष के द्वारा प्राप्त
की गई देखी जाती हैं, वे उस पुरुष के द्वारा अपने प्रयत्नरूपी वृक्ष से ही प्राप्त की गई हैं ॥ ३ ७॥ जिन्होंने
अपना अन्तःकरण पवित्र कर लिया है, जो आत्मतत्त्व-ज्ञान से सम्पन्न है, जो सदा सन्तुष्ट हैं तथा जो
सबके द्वारा वांछित परमप्रेमास्पद आत्मसुख को प्राप्त हुए हैं, उन महात्माओं के लिए सिद्धियाँ कुछ भी
उपकार नहीं करतीं ॥३ ८॥
श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, मुझे यह एक संशय हो रहा है कि महामुनि वीतहव्य की वह देह हिंसक
बाघ आदि द्वारा भक्षित क्यों नहीं हुई और पृथ्वी में कीचड़ आदि के क्लेद से विशीर्णं क्यों नहीं हुई ॥ ३ ९॥
भगवान्, अरण्य-स्थित ये वीतहव्य मुनि उसी समय (जब पृथ्वी में ढक गये थे, उसी समय) तत्काल
विदेहमुक्त क्यों नहीं हुए ? इन दो प्रश्नों का यथार्थ उत्तर मुझसे कहिए