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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदा ह्यस्तंगतप्रायं जातं चित्तं विचारतः । तदा हि वीतहव्यस्य जाता मैत्र्यादयो गुणाः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, महामुनि वीतहव्य की नाई अपने को तत्त्वज्ञानी बनाकर आप राग, भय ओर उद्वेग से वर्जित होकर सदा स्थित रहिए

सर्ग सन्दर्भ

अद्रासीर्वोँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग जिनका मोह शान्त हो चुका है, ऐसे महात्माओं को आकाशगमन आदि सिद्धियों की इच्छा नहीं होती तथा उनके शरीरो को व्याघ्र आदि हिंसक प्राणी घर्षित नहीं कर सकते, यह कथन |