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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

जीवन्मुक्तमनोनाशे सत्त्वनाम्नि हिमालये । वसन्त इव मञ्जर्यः स्फुरन्ति गुणसंपदः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ को यहाँ न तो कृत कर्म से (विधियुक्त अनुष्ठान से) ही प्रयोजन (पुण्य) है ओर न अकृत कर्म से ही (विहिताकरण से ही) प्रयोजन (प्रत्यवाय-प्राप्ति) है, क्योकि ज्ञानवान्‌ को ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक सब भूतो मे कोई भी पदार्थ प्रयोजन के लिए आश्रय योग्य नहीं हे