Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 73
इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवाँ सर्ग शरीर भौतिक है, अतः वह शोक, मोह के योग्य नहीं है, इसका तथा दृग-दृश्य के सम्बन्ध और विशुद्ध साक्षी का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महाभाग श्रीरामजी, आप देह के उत्पन्न होने पर न तो उत्पन्न होते है…
- Verse 2मैं गोरा हूँ, मैं मोटा हूँ इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से आत्मा में देहरूपता का साक्षात् अन…
- Verse 3नश्वर-स्वभाववाले इस देह के नष्ट हो जाने पर आत्मा अपनी सहज स्थिति को प्राप्त हो जाता है, ऐ…
- Verse 4यदि आत्मा का देह के साथ तादात्म्य नहीं है, तो जैसे शाखा के कम्पनों से वृक्ष मेँ कम्पन होत…
- Verse 5हे श्रीरामजी, जैसे सरोवर, तद्गत पंक और निर्मल जल का सम्बन्ध किसी प्रकार के परस्पर के अनुर…
- Verse 6जैसे मार्ग पथिको के संयोग ओर वियोग की अवस्था में आस्था (अहन्ता ओर ममता के अभिमान) एवं परि…
- Verse 7वैसे क्यो है ? इस पर कहते हैं। जैसे कल्पित वेताल के कराल वदन, दाँत आदि विकारों से जनित प्…
- Verse 8जैसे एक ही वृक्ष से विलक्षण विलक्षण पुतलियाँ (भीतियाँ) बनाई जाती हैं, वैसे ही पाँचभूतों क…
- Verse 9जैसे लकड़ियों के बोझे में लकड़ियों के सिवा ओर कुछ नहीं दिखाई पडता, वैसे ही पृथ्वी, जल, ते…
- Verse 10हे मनुष्यो, तुम लोग पाँच भूतो का क्षोभ, नाश ओर उत्पत्ति होने पर हर्ष, अमर्ष ओर विषाद के व…
- Verse 11अपनी देह मे स्नेह आदि की अयोग्यता बतलाकर अव स्त्री आदि के शरीरो में भी स्नेह आदि की अयोग्…
- Verse 12सुकुमार और सुन्दर अवयव- सन्निवेश ही स्त्री के शरीर में अतिशय है, तो इस पर कहते हैं। सुकुम…
- Verse 13भाई आदि में राग का निवारण करते हैं। जैसे एक पत्थर से उत्पन्न हुई दो पाषाण-प्रतिमाओं के पर…
- Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, मिट्टी से बनाई गई प्रतिमाओं का समागम होने पर भी जिस प्रकार उनका परस्प…
- Verse 15जैसे पत्थर की बनाई गई प्रतिमाएँ अन्योन्य स्नेह-सम्बन्ध के भाजन नहीं है, वैसे ही देह, इन्द…
- Verse 16जैसे यत्र यत्र भिन्न भिन्न प्रदेशमें उत्पन्न हुए तिनकों को तरंगे पर्याप्त रूप से एकत्र कर…
- Verse 17जैसे समुद्र के जल में तृण एक दूसरे से मिल जाते हैं और पृथक् हो जाते हैं, वैसे ही रागाभिम…
- Verse 18जैसे सागर आवर्ताकार की कल्पना से वृद्धिगत आकार को प्राप्त कर तृण, काठ आदि पदार्थों को बटो…
- Verse 19तब किस उपाय से आत्मा भ्रूतसम्बन्ध के हेतुभूत चित्तभाव से मुक्त होता है ? इस प्रश्न पर उस…
- Verse 20तदनन्तर प्रबोधकालमें ही मन के द्वारा सम्पादित भूताश्लेष से विनिर्मुक्त होकर अपने देह को उ…
- Verse 21दर्शन का फल बतलाते है। भूतसमूह को अपने से पृथक् देखकर अविनाशी आत्मा देहातीत हो जाता है ओ…
- Verse 22तदनन्तर जैसे मद्य के मद से मत्त हुआ पुरुष मद के निकल जाने पर भीतर अपने पूर्व विज्ञान का स…
- Verse 23जिस प्रकार समुद्र में तरंगरूपी कणों के कललोलों से असीम जल प्रस्पन्दित होता है उसी प्रकार…
- Verse 24हे श्रीरामजी, जिनका समस्त राग विनष्ट हो गया है, जिनके पाप दूर हो गये हैं तथा जो परब्रह्मप…
- Verse 25जैसे समुद्र की ऊर्मियाँ विविध श्रेष्ठ रत्नों से सम्बद्ध होने पर भी उनमें अनासक्ति के कारण…
- Verse 26जैसे तीर और काष्ठों से समुद्र म्लान (दीन) नहीं होता तथा जैसे रजःकणों से आकाश म्लान नहीं ह…
- Verse 27जैसे समुद्र को गत, आगत, स्वच्छ, चपल, मलिन एवं जड़ तरंगों से राग और द्वेष नहीं होता, वैसे…
- Verse 28तत्वज्ञ को क्यो अनुराग नहीं होता ? इस शंका पर कहते हैं। चूँकि तत्त्वज्ञ पुरुष इस जगत् मे…
- Verse 29जो अहम्, भूत आदि तथा तीनों कालों मे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ दृश्य और दर्शन के सम्बन्धो…
- Verse 30हे श्रीरामचन्द्रजी, इस जगत् में दो पदार्थ हैं एक दृश्य और दूसरा द्रष्टा इन दो पदार्थो के…
- Verse 31क्या असत्य वस्तु के विषय में हर्ष और शोक होते है ? या सत्य वस्तु के विषय में ? या सत्यासत…
- Verse 32हे सुन्दरनेत्रवाले श्रीरामजी, मिथ्या दर्शनरूपी भरम को छोडकर आप यथार्थ वस्तु का अवगम करिये…
- Verse 33भोग-सुख के लिए सभी लोग विषय और इन्द्रियो का सम्बन्ध मानते हैं, उस सम्बन्ध की अवस्था में अ…
- Verse 34विषय ओर इन्द्रियों का सम्बन्ध होने पर सर्वोत्तम जो सुखानुभूति होती है, वह अज्ञानी पुरुष क…
- Verse 35रम्य विषयों का और इन्द्रियवृत्तियों का परस्पर सम्बन्ध होने पर उत्पन्न होनेवाला जो सुख है,…
- Verse 36दुःखरूपी बीमारी से वर्जित दृश्य ओर ऐन्द्रियक वृत्तियों के सम्बन्ध से जनित सुखानुभव, यदि क…
- Verse 37दृश्य ओर दर्शन के सम्बन्ध से होनेवाली जो अखण्ड पूर्णानन्द स्फुरण-स्वरूप दृश्य और दर्शन से…
- Verse 38उक्त प्रकार की दृष्टि का अखण्ड -पूणानन्द -स्फुरणात्मक सुखानुभूति का) अवलम्बन करने पर आत्म…
- Verses 39–40हे श्रीरामचन्द्रजी, जब दृश्य ओर दर्शन के सम्बन्ध से निर्मुक्त और परम बुद्धि से युक्त यह स…
- Verse 41उक्त अवस्था मेँ आत्मा न अहंरूप रहता है, न अन्य स्वरूप रहता है, न एकत्व संख्या से युक्त रह…
- Verse 42तुर्यावस्था में आत्मा न तो प्राप्य है, न अत्यन्त अप्राप्य है, न सर्वात्मक हे, न व्यापक है…
- Verse 43उक्त अर्थ में युक्ति कहते हैं। मन के साथ जो चक्षु आदि छः इन्द्रियाँ है, उनका विषय जो यह द…
- Verse 44हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस प्रकार का यह जगत् है, उस प्रकार के इस जगत् को भलीभाँति जाननेवाल…
- Verse 45तब क्यो भूमि आदिभूत दिखाई देते हैं ? इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, यह आत्मा ही अपने स्वरू…
- Verse 46यह आपने कैसे निश्चय किया कि आत्मा ही उस प्रकार से अवस्थित है ? इस पर कहते हैं। हे श्रीराम…
- Verse 47जो कुछ पहले कहा, उस सबको एकत्र कर उपसंहार करते हैं। श्रीरामजी, समस्त काल और असीम कालक्रमो…