Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
सम्यगालोकिताशेषपूर्वापरजगत्क्रमः ।
मा शोकं गच्छ सुमते मौर्ख्योपगतलोकवत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
भोग-सुख के लिए सभी लोग विषय और इन्द्रियो का सम्बन्ध मानते हैं, उस सम्बन्ध की अवस्था
में अभिव्यक्त होनेवाला जो सुख है, उसका स्वतः प्रकाश होने के कारण वह अनुभूतिस्वरूप है, वृत्तिरूप
उपाधि के बल से प्रतीयमान भेद, तारतम्य आदिके निरास से अखण्ड के साथ ऐक्य होने पर वह सुख
ब्रह्मस्वरूप ही है, पथक् नहीं है, ऐसा कहते हैँ ।
रम्य विषय और इन्द्रियजनित वृत्तियो का परस्पर सम्बन्ध होने पर अपनी आत्मा में उत्पन्न जो
परमात्मस्वरूपसुख है, वह रम्य विषय ओर इन्द्रियों के परस्पर सम्बन्ध के विस्तार से अभिव्यक्त
(प्रकाशित) होता है । इसलिए अनुभूत-स्वरूप सुख ब्रह्म ही कहा जाता हे