Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
इयं पुर्यष्टके स्वेच्छा स्वात्मन्येवात्मनि स्थिते ।
सति स्फुरत्यभ्युदिते भानाविव जनैषणा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र की ऊर्मियाँ विविध श्रेष्ठ रत्नों से सम्बद्ध होने पर भी उनमें अनासक्ति के कारण
सिल्लियों (एक प्रकार के पत्थरों) के टुकड़ों की भाँति ही व्यवहार करती है, वैसे ही वासना वर्जित
उत्तम महात्मा लोग भी चित्त के व्यवहारों से सम्बन्ध होने पर भी उनमें अनासक्ति के कारण ऊपर
ऊपर से ही व्यवहार करते हैं