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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवंविचारया दृष्ट्या द्वैतत्यागेन राघव । स्वभावः प्राप्यते तज्ज्ञैस्तज्ज्ञैश्चिन्तामणिर्यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महाभाग श्रीरामजी, आप देह के उत्पन्न होने पर न तो उत्पन्न होते हैं और न देह के विनष्ट होने पर नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि अपने स्वरूप में आप किसी तरह के कलंक से कलंकित नहीं हैं यानी निज स्वरूप से आप विशुद्ध हैं, अतः आपकी देह कोई चीज नहीं है

सर्ग सन्दर्भ

इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवाँ सर्ग शरीर भौतिक है, अतः वह शोक, मोह के योग्य नहीं है, इसका तथा दृग-दृश्य के सम्बन्ध और विशुद्ध साक्षी का वर्णन ।