Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
दिक्कालाद्यनवच्छेदान्न बद्धोऽयं कदाचन ।
बन्धाभावे क्व मुक्तिः स्यादमोक्षस्तेन संस्थितः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या असत्य वस्तु के विषय में हर्ष और शोक होते है ? या सत्य वस्तु के विषय में ? या सत्यासत्य
वस्तु के विषय में ? इन तीन विकल्पों में भी हर्ष और शोक की योग्यता नहीं है, ऐसा कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जो असत्य वस्तु है, उसके विषय में हर्ष-शोक करना व्यर्थ ही हे, क्योकि वह तो
असत्य ही ठहरा । जो सत्य वस्तु है उसके विषय में भी हर्ष-शोक करना अनुचित है, क्योकि सत्य वस्तु
सदा-सर्वदा प्राप्त ही है, इसलिए ऐसी वस्तु के विषय में लाभ-प्रयुक्त हर्ष ओर हानि-प्रयुक्त शोक ये
कैसे हो सकते हैं अब तृतीय विकल्प बचा, वह भी अयुक्त है, क्योकि सत्य-असत्य एक वस्तु हो ही
नहीं सकती, कारण कि एक वस्तु में सत्यत्व और असत्यत्व ये दो विरुद्ध धर्म नहीं रह सकते | ऐसी
परिस्थिति में यह तृतीय विकल्प प्रथम विकल्प के सदृश हो जाने से प्रथम विकल्पोक्तदूषण ही इसमें
आ गया । जब ऐसी वास्तव में स्थिति है, तब जगत् में हर्ष-शोक-योग्य किसी वस्तु के न रहने से उसके
लिए आपको शोक करना व्यर्थ ही है