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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verses 39–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 39,40

संस्कृत श्लोक

अयं मोक्षस्त्वयं बन्धः पेलवां कलनामिति । परित्यज्य महात्यागी स त्वमेव भवाभव ॥ ३९ ॥ परिगलितविकल्पनां प्रयातः सगरसुतौघनिखातमेखलाङ्कम् । अवनिवलयमन्तरस्तसङ्गश्चिरमनुपालय सर्वदोदितश्रीः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, जब दृश्य ओर दर्शन के सम्बन्ध से निर्मुक्त और परम बुद्धि से युक्त यह स्वरूप दृष्टि होती है, तब दृश्य ओर दर्शन के सम्बन्ध के असली तत्त्व को जानकर पुरुष तुर्यावस्था को प्राप्त होता हे । ((ुर्यस्वरूपा मुक्तिमें आत्मा का जो स्वरूप रहता है, उसे बतलाते हैं) हे श्रीरामजी, तुर्यतारूप मुक्तिमें आत्मा न तो स्थूल रहता है, न अणु रहता है, न प्रत्यक्षात्मक वृत्ति का विषय रहता है, न अविषय रहता है, न चैतन्य युक्त रहता है, न जड रहता है, न असत्‌ ही रहता है, न अस्तित्वरूप भावविकार से युक्त रहता है