Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 73, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अनादित्वान्न जातोऽयमजातत्वान्न नश्यति ।
आत्मात्मव्यतिरिक्तं तु नाभिवाञ्छत्यसंभवात् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस जगत् में दो पदार्थ हैं एक दृश्य और दूसरा द्रष्टा इन दो पदार्थो के बीच
में केवल दृष्टि के यानी दृष्टि स्वरूप साक्षीभूत आत्मा के द्वारा सिद्ध हुआ जो दृश्य पदार्थ हे, वह असत्
है या सत् है इस विषय का अभी तक निर्णय न हो सकने के कारण दृश्य हर्ष ओर शोक के लिए अयोग्य
ही है और दूसरा स्वतःसिद्ध जो साक्षीरूप आत्मा है, वह तो असंग है, इसलिए उत्पन्न हुए भी हर्ष और
शोक से वह सम्बद्ध नहीं होता, ऐसी स्थिति में दुक् ओर दृश्य दोनों को सत् या असत् मानने पर भी
हर्ष-शोक की संभावना नहीं हो सकती, यह तात्पर्य हे