Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 40
उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीयवाँ सर्ग राजा विदूरथ के सोने पर सरस्वती ओर लीला का गृहप्रवेश ओर आतिवाहिक देह का तत्त्व वर्णन ।
44 verse-groups
- Verses 1–5श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, निशाचरो के कारनामों से अत्यन्त घोर रणांगण में…
- Verse 6तदनन्तर उन दोनों ललनाओं ने पूर्वोक्त मण्डपाकाश को छोड़कर उस घर मेँ जैसे वायु सुराखोँ से क…
- Verse 7श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : विद्वन्मूर्ध्न्य, इतना बड़ा चार हाथ का यह स्थूल शरीर कमल की ताँत…
- Verse 8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे अनघ, जिसको यह भ्रम रहता है कि यह शरीर आधिभौतिक है, उस पुरुष का य…
- Verse 9इस शरीर ने मुझे यहाँ प्रवेश करने से रोक दिया, अतः इस छिद्र में मैं नहीं समा सकता, क्योंकि…
- Verse 10किन्तु जिस पुरुष को, स्थूल मनुष्य देह में तादात्म्यबुद्धि न होने और मेरा एकमात्र आतिवाहिक…
- Verse 11बाहर भी वस्तुशक्ति का स्वभाव वैसे ही एकरूप देखा गया है, ऐसा कहते हैं । जैसे जल कभी ऊपर को…
- Verse 12स्थूल देह में आत्मबुद्धि न रखनेवाले योगी, पिशाच आदि को भी जब स्थूलदेहजनित निरोधदु:ख नहीं…
- Verse 13अधिष्ठान रुप ज्ञान में स्थूलता, सूक्ष्मता आदि शक्तियों का आविभवि होने पर भी चित्त में स्थ…
- Verse 14ज्ञानप्रयत्न से अन्यथाभाव का उदाहरण देते हैं। यह “रज्जू है, यों प्रयत्नपूर्वक रज्जुपदार्थ…
- Verse 15जैसे चित्त सवित्-शवक्ति का अनुसरण करती है, वैसे ही चेष्टा भी चित्त का अनुसरण करती है, यह…
- Verse 16स्थूल शरीर के समान आतिवाहिक चित्तशरीर का भी निरोध क्यो नहीं होता इस पर कहते हैं। जो स्वप्…
- Verse 17यदि कोई शंका करे कि भौतिक शरीर ज्ञानबलसे चित्त शरीर कैसे बन जाता 2 इस शंका पर कहते है। वा…
- Verse 18प्राणियों की चित्त से पथक् सत्ता नहीं है, इसका उपपादन करते हैँ । परमात्मा की इच्छा के अन…
- Verse 19चित्त ओर अव्यक्त का भी शुद्ध चित्त से पृथक् अस्तित्व नहीं है, ऐसा कहते हैं । हे श्रीरामच…
- Verse 20यद्यपि स्थूलशरीर ओर चित्तशरीर दोनों ही अधिष्ठान सत्ता के अधीन सत्तावाले हैं, फिर भी स्थूल…
- Verses 21–25निष्कर्ष यह कि स्थूल शरीर बाह्य वस्तुओं का अनुसरण करता है, अतः उसका निरोध होने पर भी संवे…
- Verse 26जिसका कर्मानुसारी प्रबोध उद्रेग से विपर्यस्त नहीं हुआ ऐसा चित्तशरीर सर्ग के आदि में आकाशा…
- Verse 27जैसे मृगमरीचिका आदि में मिथ्या जल का उदय होता है एवं जैसे स्वप्न में यह स्फुरण वन्ध्यापुत…
- Verse 28सूक्ष्मतम चित्त ही सम्पूर्ण जगत् है, सर्वशक्तिशाली है उसको जब तक तत्त्व का परिज्ञान हो ज…
- Verses 29–30पूर्वोक्त पक्षों से प्रथम पक्ष का ही अगीकार कर श्रीवस्रिष्ठजी उत्तर देते हैं । श्रीवसिष्ठ…
- Verses 31–32जिस मृत्युरूपी मूर्छा का हरेक आदमी अनुभव करता है, हे सुमते, उसे आप महाप्रलयरूपी रात्रि सम…
- Verse 33महाप्रलयरूप रात्रि का अवसान होने पर जैसे समष्टिचित्तशरीर म् देह के अन्दर पर्वतभाव आदि स्…
- Verse 34“यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति” (जिसका मन से स्मरण करता है, उसे वाणी से…
- Verse 35जैसा आप (श्रीरामचन्द्रजी) कहते हैं, वैसा होता, यदि ब्रह्मा की आदि सृष्टि यथार्थ अनुभव सरे…
- Verses 36–38तत्त्वज्ञानी हम लोग भी अवश्य मुक्त हो जाते हैं फिर ब्रह्मा आदि क्यों न विदेहमुक्त होंगे…
- Verse 39यदि श्रीरामचन्द्रजी को यह शंका हो कि हिरण्यगर्भ की सृष्टि प्रकृति से महत्, अहंकार आदि क्…
- Verse 40वही व्योमात्मक प्रकृति जब प्रबुद्ध यानी चित्प्रतिफलित होती है अर्थात् जब उसके अहंकार का…
- Verse 41तदनन्तरे ही कुछ स्थूल होकर पाँच इन्द्रियरूप से उद्बुद्ध होते हैं । वे ही स्वप्न ओर जाग्रत…
- Verses 42–43चिरकालिक प्रत्यय से कल्पना द्वारा स्थूल हुआ वह आतिवाहिक स्वरूप बालक की नाई मेँ आधिभौतिक ह…
- Verse 44तदुपरान्त स्थूल देह के आश्रित चक्षु आदि के आधीन स्थित हुई तत्-तत् देश और काल के पदार्थो…
- Verse 45जहाँ पर वह प्राणी मरता है, वहाँ उसी को शीघ्र देखता है, वहीं पर इस भुवनाभोग को इरी प्रकार…
- Verse 46आगन्तुक देह आदि रूप से आत्मवान् हुआ सा व्योमरूपी जीव आगन्तुक देह आदि को आत्मा समझकर निर्…
- Verses 47–50उक्त जगद्भ्रम का ही विस्तार से प्रतिपादन करतेहै। उस जगद्भ्रम का अनुभव करता है, जो इन्द्र…
- Verses 51–53अब प्रत्येक जीव के उसी संसार का वनसमूह रूपसे वर्णन करते है । यह संसाररूपी वन समूह प्रत्ये…
- Verses 54–55जहाँ पर यह जीव मरता हे, वहीं पर इस प्रकार से वर्णित वनखण्ड को एक क्षण में देखने लगता ह ।…
- Verse 56इस प्रकार ये मिथ्या ब्रह्माण्ड की सृष्टियाँ अनेक बार बीत चुकी हैँ, बीतेगी ओर बीतती हैं, ज…
- Verse 57इस प्रकार प्रपंच के आरोपक्रम का वर्णन कर अब क्रमश: अपवाद का वर्णन करते हैं। इस प्रकार कुड…
- Verse 58मन के स्वरूप का जब विचार करते है, तब वह साक्षी से अतिरिक्त नहीं ठहरता और साक्षी भी ब्रह्म…
- Verse 59उक्त बात का ही दृष्टान्तो से समर्थन करते हैँ । जो जल है वही आवर्त है यानी आवर्त जल से अति…
- Verse 60चिदाकाश का अभूत असत्य अथवा अनादि मायाकाश में अथवा सूक्ष्म भूतों के कार्यभूत चित्ताकाश में…
- Verse 61मुझसे जिसका अर्थ (अधिष्ठान सन्मात्र) ज्ञात है वह जगत् शब्द परम अमृत (नित्य, शुद्ध, बुद्ध…
- Verses 62–63उक्त का उपसंहार कर उसका प्रकृत में सम्बन्ध जोड़ते हैं । इससे यह निश्चित हुआ कि लीला ओर सर…
- Verse 64अपनी स्पृहा और कामना के अनुसार सदा यत्र तत्र आकाश में आविर्भूत होती थी, इस कारण से राजा व…