Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
छायायामुपविष्टस्य कुतस्तापानुभूतयः ।
यस्य संवेदनेऽन्योऽर्थः केनचिन्नानुभूयते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूल देह में आत्मबुद्धि न रखनेवाले योगी, पिशाच आदि को भी जब स्थूलदेहजनित
निरोधदु:ख नहीं होता, तब द्वैतमात्र के अध्यास से रहित तत्त्वज्ञानियों को वह दुःख नहीं होता,
इसमें तो कहना ही क्या है ? इस आशय से कहते हैं।
छाया में बैठे हुए पुरुष को ताप का अनुभव कहाँ से हो सकता है ? परमात्मा का यथार्थ
ज्ञान होने पर उससे अतिरिक्त पदार्थ का किसी को अनुभव नहीं होता