Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
यदेव तच्चिदाकाशं तदेव मननं स्मृतम् ।
यदेव च चिदाकाशं तदेव परमं पदम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के स्वरूप का जब विचार करते है, तब वह साक्षी से अतिरिक्त नहीं ठहरता और साक्षी
भी ब्रह्म से भिन्न नहीं है, यों एकमात्र परिपूर्ण चित् का ही परिशेष रहता है, ऐसा कहतेहै।
जो अखण्ड आनन्दस्वरूप चिदाकाश हे, वही मन कहा गया हे, चिदाकाश से अतिरिक्त
मन नहीं है ओर जो चिदाकाश है वही परम पद है