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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं निशाचराचारचिरघोरे रणाङ्गणे । अहनीव जनाचारे स्थिते यामावरेहिते ॥ १ ॥ हस्तहार्यतमःपिण्डस्फुटकुड्ये निशागृहे । लाभोच्छदोच्चलचते भूतसङ्घे प्रवल्गति ॥ २ ॥ निःशब्दे ध्वान्तसंचारे निद्रारुद्धककुब्गणे । लीलापतिरुदारात्मा किंचित्खिन्नमना इव ॥ ३ ॥ प्रातःकार्यं विचार्याशु मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः । दीर्घचन्द्रसमाकारे शयने हिमशीतले ॥ ४ ॥ चन्द्रोदरनिभे चारुगृहे शिशिरकोटरे । निद्रां मुहूर्तमगमन्मुद्रितेक्षणपुष्करः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, निशाचरो के कारनामों से अत्यन्त घोर रणांगण में यमदूतों ओर निकृष्ट श्रेणी के जीवों की (भूत, पिशाच आदि की) चेष्टाओं के दिन में मनुष्यों के यथोचित आचरण की नाई पूर्वोक्त प्रकार से सम्पन्न होने पर हाथ से पकड़ने के योग्य यानी निबिड अन्धकार राशि से जिस में साफ साफ दीवार बनी थी ऐसे रात्रि रूपी घरमें भक्ष्य पदार्थो की प्रचुरमात्रा में प्राप्ति होने पर वस्त्र पसार कर माँगना जिनसे कोशो दूर भाग गया था ऐसे भूतगणो के क्रीडा करने पर निद्रा से आक्रान्त दशों दिशाओं में अन्धकार का संचार होने पर कुछ खिन्न से हुए उदाराशय लीलापति ने प्रातःकाल के कार्य में सलाह देने में दक्ष मन्त्रियों के साथ भी विचार किया, तदन्तर चन्द्रमा के सदृश आकारवाले बर्फ के सदश शीतल शयन पर नेत्र कमलों को बन्दकर एक क्षण में निद्रा की गोद में विश्राम लिया

सर्ग सन्दर्भ

उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीयवाँ सर्ग राजा विदूरथ के सोने पर सरस्वती ओर लीला का गृहप्रवेश ओर आतिवाहिक देह का तत्त्व वर्णन ।