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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

मरणादिमयी मूर्च्छा प्रत्येकेनानुभूयते । यैषा तां विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम् ॥ ३१ ॥ तदन्ते तनुते सर्गं सर्व एव पृथक्पृथक् । सहजस्वप्नसंकल्पान्संभ्रमाचलनृत्यवत् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस मृत्युरूपी मूर्छा का हरेक आदमी अनुभव करता है, हे सुमते, उसे आप महाप्रलयरूपी रात्रि समझिये, महाप्रलयरूपी रात्रि का अन्त होने पर सभी लोग अलग अलग सृष्टि का विस्तार करते हैं । जिसका जैसा ज्ञान और जैसे कर्म होते है, वह तदनुरूप सृष्टि का दर्शन और अनुभव करते है, भाव यह कि जैसे रोगी चित्त-व्यामोह से पर्वतों का नृत्य देखता है, वैसे ही जीव अनादिस्वाभाविक अविद्या के प्रभाव से उत्पन्न तीन अवस्थाओं के संकल्पो को देखता है