Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

एतच्चित्तशरीरत्वं विद्धि सर्वगतोदयम् । यथासंवेदनेच्छत्वाद्यथासंवेदनोदयम् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि स्थूलशरीर ओर चित्तशरीर दोनों ही अधिष्ठान सत्ता के अधीन सत्तावाले हैं, फिर भी स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में विशेषता है, वह यह कि वह निरोध का हेतु नहीं है, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप इस चित्तशरीर को ऐसा समझिये कि इसने सम्पूर्ण पदार्थों में आविरभावशक््ति प्राप्त की है । कहीं पर भी इसके लिए रोकटोक नहीं हो सकती, क्योकि उसका उदय (आविर्भाव) संवेदन यानी पूर्व वासना और कर्म का अनुसरण करनेवाले पदार्थो की स्फूर्ति के अनुसार होता है, उसका स्वभाव बाहर की वस्तु का अनुसरण करना नहीं है, क्योकि संवेदन के अनुसार ही उसकी इच्छा होती है भाव यह कि वह रजतरूप से ज्ञात शुक्ति (सीप) की भी इच्छा करता है, शुक्ति का अनुसरण कर उसकी उपेक्षा नहीं करता