Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच महति प्रलये राम सर्वे हरिहरादयः ।
विदेहमुक्ततां यान्ति स्मृतेः क इव संभव ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसा आप (श्रीरामचन्द्रजी) कहते हैं, वैसा होता, यदि ब्रह्मा की आदि सृष्टि यथार्थ
अनुभव सरे उत्पन्न सृष्टि की हेतु स्मृति होती तो पहले पहल हिरण्यगर्भपद को प्राप्त हुए
उपासक को उक्त स्मृति नहीं हो सकती, कारण कि उसकी स्मृति उपासना से प्राप्त संस्कार
से उत्पन्न है, यथार्थ अनुभव से उत्पन्न नहीं है । पूर्व जन्म की उपासना व्यष्टि की ही है ।
व्यष्टिका समष्टिभाव चिन्तन यथार्थनुभव नहीं है । इसलिए यथार्थ उपासना के संस्कार से
उत्पन्न स्मृति से जन्य होने के कारण आदि सर्य में सत्यत्व का प्रसंग नहीं आ सकता । पहले
कल्प के कोई भी सर्वज्ञ पुरुष द्वितीय कल्प में नहीं कर सकते, क्योकि सभी पहले कल्प में ही
मुक्त हो चुके । द्वितीय कल्प में आदि सृष्टि की हेतुभूत स्मृति पूर्वकल्प की सृष्टि में अनुभूत
मिथ्या पदार्थ विषयक ही है, इसलिए कहीं भी सृष्टिसत्यता का प्रसंग नहीं हो सकता, इस
आशय से श्रीवसिष्ठजी समाधान करते हैं ।
वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, महाप्रलय में सभी हरि, हर आदि विदेह मुक्ति
को प्राप्त हो जाते हैं, अतः पूर्वसर्ग की स्मृति का संभव ही कहाँ है ?