Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यः पुनः स्वप्नसंकल्पपुरुषः प्रतिमाकृतिः ।
आकाशमात्रकाकारः स कथं केन रोध्यते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूल शरीर के समान आतिवाहिक चित्तशरीर का भी निरोध क्यो नहीं होता इस पर
कहते हैं।
जो स्वप्न के पुरुष की नाई और मनोरथ निर्मित प्रतिमा की नाई केवल आकाशमात्रशरीर
है (शून्यात्मकशरीर है) उसे कौन कैसे रोक सकता है ?