Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच किं चित्तमेतद्भवति किंवा भवति नौ कथम् ।
कथमेव न सद्रूपं नान्यद्भवति वीक्षणात् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्मतम चित्त ही सम्पूर्ण जगत् है, सर्वशक्तिशाली है उसको जब तक तत्त्व का
परिज्ञान हो जाता है, तब वही व्यवहार में सर्वत्र अप्रतिहत और स्वतन्त्र हो जाता है, ऐसा
आपने कहा। इस पर हमारी जिज्ञासा है कि क्या हम लोगो का प्रत्येक चित्त ऐसी शक्ति
रखता है या नहीं ? प्रथम पक्षमें प्रत्येक पुरुष के चित्त मे भिन्न-भिन्न रूप से विद्यमान
जगत् सद् हो जायेगा । द्वितीय पक्ष में चित्त से उत्यन्न न हुआ जगत् चित्त से विलक्षण ही
होगा, क्योकि वैसे ही सब लोग देखते हैं, या ऐसी परिस्थिति में ज्ञान से चित्त का विनाश
होने पर भी जगत् की अनुवृत्ति ही होगी, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
महाराज, जो शक्ति आपने कही उस शक्ति से युक्त हम लोगों का चित्त है अथवा
नहीं ? पहले पक्ष में प्रत्येक चित्त मेँ भिन्न जगत् सद्रूप क्यों नहीं होगा और दूसरे पक्ष में
वह चित्त से अतिरिक्त क्यों न होगा, क्योकि ऐसा ही सब लोग देखते हैं