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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच मृतेरनन्तरं सर्गो यथा स्मृत्यानुभूयते । चिरात्तथानुभवति नातो विश्वमकारणम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

“यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति” (जिसका मन से स्मरण करता है, उसे वाणी से बोलता है, उसे कर्मेन्द्रिय से करता है) इस श्रुति से ओर सब लोगो के अनुभव से स्मृति के तुल्य सम्पूर्ण क्रियाएँ एकवस्तुविषयक हैं, यह निश्चित है, स्मृति भी यदि स्मृति का कारण अनुभव सत्य हो तो यथार्थ होती है और उसके कारणभूत अनुभव के तिथ्या होने पर असत्य होती है । ऐसी परिस्थिति में हम लोगों में भान्ति प्रचुरमात्रा में विद्यमान है और हम लोगोका संकल्प असत्य है, अतः हमारी स्मृति के यथार्थ होने के कारण उससे उत्पन्न कतिपय स्वप्न आदि प्रपंच भले ही मिथ्या हों, किन्तु हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) सर्वज्ञ होने से भ्रान्ति शून्य हैं और सत्यसंकल्प हैं, अत: उनकी स्मृति यथार्थ कदापि नहीं हो सकती, फिर उनके द्वारा सृष्ट प्रपंच मिथ्या कैसे ? इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जैसे व्यष्टि जीवों को मरने के बाद तुरन्त स्मृति से अपने द्वारा रचित सर्ग का अनुभव होता है, वैसे ही समष्टि जीव (ब्रह्मा) भी चिरकालिक महाप्रलय के बाद अपनी यथार्थ स्मृति से सृष्ट प्रपंच का अनुभव करते हैं, अत: “उनकी स्मृति से उत्पन्न प्राक्तन सत्य पदार्थ ही था, कल्प के सत्य विश्व के कारण हो सकते हैं, अत: विश्व अकारण नहीं हे । विश्व ब्रह्मा से अतिरिक्त कारण से शून्य है, ऐसी जो पहले प्रतिज्ञा की थी, उस मत का व्याघात हुआ, यह भाव है