Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चित्तमात्रं शरीरं तु सर्वस्यैव हि सर्वतः ।
विद्यते वेदनाच्चैतत्क्वचिदेतीव हृद्गतात् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि भौतिक शरीर ज्ञानबलसे चित्त शरीर कैसे बन जाता 2 इस शंका
पर कहते है।
वास्तव में सभी लोगों का सभी जगह चित्तमात्र ही शरीर है, किन्तु कहीं पर हृदय में स्थित
ज्ञान के बल से वह कहीं आता हुआ-सा प्रतीत होता हे । आता हुआ-सो प्रतीत होता है, वह
भ्रम है, वास्तव में प्राणी चित्त से अतिरिक्त नहीं हे, यह भाव हे