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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

सर्वत्र संभवति चिद्गगनं तदत्र सद्वेदनं कलनमामननं विसारि । तच्चातिवाहिकमिहाहुरकुड्यमेव देहं कथं क इव तं वद किं रुणद्धि ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी स्पृहा और कामना के अनुसार सदा यत्र तत्र आकाश में आविर्भूत होती थी, इस कारण से राजा विदूरथ के घर में उनका गमन हुआ ॥६ ३॥ चिदाकाश का सर्वत्र सम्भव है, कहीं पर भी उसका प्रतिरोध नहीं होता । वही कलन होकर यानी मानसिक विषयों का अवधारण करने तक बाहर प्रसरण करनेवाला बनकर यथार्थ ज्ञान होता है। उस आतिवाहिक देह को सूक्ष्म ही कहते हैं, उसे कौन पुरुष किसलिए और किस प्रकार से रोक सकता है, यानी उसका निरोध किसी प्रकार भी नहीं हो सकता