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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

वृद्धिमित्थमयं यातो मुधैव भुवनभ्रमः । स्वप्नाङ्गनासङ्गसमस्त्वनुभूतोऽप्यसन्मयः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त स्थूल देह के आश्रित चक्षु आदि के आधीन स्थित हुई तत्‌-तत्‌ देश और काल के पदार्थो की कल्पनाएँ उदित न होती हुई भी वायु की स्पन्दन क्रिया के तुल्य प्रादुर्भूत होती हैं ॥४ ३॥ मिथ्या ही यह जगत्‌-भ्रम इस प्रकार बुद्धि को प्राप्त हुआ हे । यद्यपि स्वप्न में स्त्रीसंगम के तुल्य इसका अनुभव होता हे तो भी यह असत्‌ ही हे । शंका : यदि यह असरत्‌ ही है तो इसका अनुभव कैसे होता है ? समाधान - जैसे स्वप्न में स्त्री के संगम का अनुभव होने पर भी वह असत्‌ है, वैसे ही यद्यपि इसका अनुभव होता है फिर भी यह असत्‌ ही है