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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 51–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, verses 51–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 51-53

संस्कृत श्लोक

प्रत्येकमेवमुदितः संसारवनखण्डकः । ताराकुसुमितो नीलमेघचञ्चलपल्लवः ॥ ५१ ॥ चरन्नरमृगानीकः सुरासुरविहंगमः । आलोककौसुमरजाः श्यामागहनकुञ्जकः ॥ ५२ ॥ अब्धिपुष्करिणीपूर्णो मेर्वाद्यचललोष्टकः । चित्तपुष्करबीजान्तर्निलीनानुभवाङ्कुरः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

अब प्रत्येक जीव के उसी संसार का वनसमूह रूपसे वर्णन करते है । यह संसाररूपी वन समूह प्रत्येक जीव में उदित हुआ हे । उक्त संसार रूप वनखण्ड में तारे ही फूल हैं, काली मेघघटा ही चंचल पल्लव हैं, इधर उधर चल फिर रहे मनुष्य ही मृगो के झुण्ड हैं, देवता ओर दत्य ही पक्षीगण हैं, आलोक्य प्रकाशपूर्णं दिन ही फूलों का रज यानी पराग है, रात्रि ही बड़े घने कुज (लतागृह) हैं । वह समुद्ररूपी बावड़ी से पूर्ण हे, सुमेरु आदि पर्वत उसके ढेले हैं, चित्तरूपी कमलबीज यानी कमलगट्टे के भीतर संस्काररूप से बैठी हुई चित्तवृत्तियाँ ही उसमें अंकुर हैँ