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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 93

बानबेवाँ सर्ग समाप्त तिरानबेवाँ सर्ग श्री वसिष्ठजी कुटी में ध्यानस्थ सिद्ध का दर्शन, कुटी के उपसंहार से उसका पतन और वसिष्ठजी से निज वृत्तान्त-वर्णन।

96 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदनन्तर-धारणा के प्रभाव से उत्पन्न हुए जगत्‌शरीर को द…
  2. Verse 2मैं अपनी पहले की कुटिया पर पहुँच गया । मैंने वहाँ चारों ओर खूब खोज की। कहीं पर भी मुझे अप…
  3. Verse 3वे सिद्ध समाधिनिष्ठ होकर आसन जमाये हुए थे । उन्होने परम प्रीति का भाजन निरतिशय आनन्दरूप ब…
  4. Verse 4उन्होने पद्मासन लगाया था । उनके सारे शरीर में शान्ति-ही-शान्ति भरी थी। समाधि द्वारा इच्छि…
  5. Verse 5म कायशिरोग्रीव्म्‌ इत्यादि श्लोक से भगवान्‌ ने जो ध्यान में आवश्यक देहस्थिति बतलाई है, उस…
  6. Verse 6नाभि के निकट भाग में चित कर रखे हुए उनके दो हाथों की शोभा ठीक खिले हुए दो कमलो की शोभा के…
  7. Verse 7भद्र, उनके दोनों नेत्रो की पलकें बन्द थीं, उनके बाह्य इन्द्रियों के समस्त व्यापार क्षीण ह…
  8. Verse 8विक्षोभों से रहित तथा पूर्णरूप से शान्त अन्तःकरणरूप कोटर को उन्होने धीर वृत्ति से एसे धार…
  9. Verse 9उस कुटिया मेँ जब मैंने अपनी देह नहीं देखी और सामने उक्त मुनि को देखा, तब वहाँ मैंने अपने…
  10. Verse 10यह कोई बड़े सिद्ध महात्मा है । मेने पहले जैसे एकान्त महाकाश की, विश्राम के लिए, इच्छा की…
  11. Verse 11मैं समाधियोग्य एकान्त स्थान पाऊँ इस चिन्ता से इन्होंने यहाँ आगमन किया है ओर यहाँ आकर सत्य…
  12. Verse 12उसके बाद दीर्घं काल तक मेरी उपेक्षा के कारण शवरूप यहाँ स्थित मेरी देहको देखा, देखने के बा…
  13. Verses 13–14अब मेरा वह शरीर तो नष्ट हो गया, अतः मैंने यह निश्चय किया कि इस आतिवाहिक देह से ही मैं अपन…
  14. Verses 15–17स्वप्न संकल्प की शान्ति हो जाने पर जैसे स्वप्न का नगर ध्वस्त हो जाता है, वैसे ही मेरे संक…
  15. Verse 18भद्र, मेरा पहले का संकल्प यह रहा कि यह कुटिया तब तक रहे जब तक कि मेरी यहाँ स्थिति बनी रहे…
  16. Verse 19तदनन्तर गिर रहे उस सिद्ध के साथ में उस आतिवाहिक देह से सज्जनतावश कहिये या कौतुकवश किये आक…
  17. Verse 20प्रवह आदि पवन स्कन्धो का जो परिवर्तन है, इससे जनित आवर्त -वृत्तियों से यानी जैसे आवर्त मे…
  18. Verse 21भद्र, जब वे आकाश से पृथ्वी पर गिरे, तब वे वैसे ही गिरे जैसे कि आकाश की उत्तम कुटिया में प…
  19. Verse 22वह सिद्ध इतने ऊँचे स्थान से गिरे, फिर भी उनका शरीर न तो टूटा ओर न उनकी समाधि ही भंग हुई,…
  20. Verse 23तदनन्तर उनको समाधि से जगाने के लिए प्रयत्नवान्‌ होकर मैंने उस समय मेघरूप धारण किया और मेघ…
  21. Verse 24मेघरूप होकर मैंने अपनी बुद्धि के प्रभाव से ओलेरूपी वज़की वृष्टि द्वारा उस महात्मा को समाध…
  22. Verse 25समाधि से जागने के बाद उनके समस्त अंगों की शोभा प्रकाशित होने लग गई ओर उनके नेत्र भी विकसि…
  23. Verse 26परमार्थ ब्रह्म मे स्थिति की हेतुभूत समाधि के शान्त हो जाने पर जब मेरे सामने वह प्रबुद्ध (…
  24. Verse 27हे मुनिश्रेष्ठ, आप कहाँ हैं, यह आप क्या कर रहे हैं, आप हैं कौन और इतने दूरसे आपका नीचे पत…
  25. Verse 28जब मैंने ऐसा प्रश्न किया, तब उन्होने मेरी ओर दृष्टि की, फिर पूर्वं गतिका स्मरण कर जैसे चा…
  26. Verse 29सिद्ध ने कहा : हे मुने, कुछ क्षण आप ठहरिये, तब तक मैं अपना वृत्तान्त याद कर लूँ । फिर मैं…
  27. Verse 30हे श्रीरामजी, ऐसा कह कर उन्होने सोचकर समस्त जन्मान्तरं के वृत्तान्तो के साथ अपना पूर्व वृ…
  28. Verse 31इसके बाद वह मुझसे यह वचन बोले । उनका वचन सुन्दर, चन्द्र-किरणों के सदृश शीतल था, आह्ादकारक…
  29. Verse 32सिद्ध ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, हाँ, अभी मैंने आपको जाना, अतः आपको मैं अभिवादन करता हूँ । मै…
  30. Verse 33हे मुने, जैसे कमलों में भरा भ्रमण करता है वैसे ही मने दीर्घकाल तक भोगरूपी सुगन्ध से पूर्ण…
  31. Verse 34तदनन्तर चित्तरूपी जल के तरगों के हिलोरों से दृश्यरूपी नदी में चक्रावर्तनों से रात-दिन बह…
  32. Verse 35संसाररूपी सागर में दृश्यरूपी तरंगों से मैं अत्यन्त व्याकुल हो गया और दीर्घकाल के बाद एसे…
  33. Verse 36सिद्ध ने जो विचार किया, उसे कहते हैं / जिनका सार केवल ज्ञान (संवित्‌) ही है, उन भोगों में…
  34. Verse 37अपरिच्छिन्न चुखको छोड़कर परिगणित फरिच्छिन्न अछुख में रमण करना उचित नहीं है, यह कहते हैं /…
  35. Verse 38ये शब्द आदि जितने विषय हैं, वे यदि स्वतःसत्तावान्‌ चिदात्मा में चिदात्मा से भिन्न माने जा…
  36. Verse 39शब्द आदि विषय विष के सदृश मरण, उन्माद आदि विषमता पैदा करनेवाले हैं, स्तर्यो कामरूप विमोह…
  37. Verse 40किसी तरह शरीर में भी आसकित उचित नहीं है, यह कहते हैं / जल्दी प्राप्त होनेवाला बुढ़ापा एक…
  38. Verse 41यह शरीर-समुद्र में बुलबुले के सदृश जल्दी ही नष्ट हो जानेवाला पदार्थ है, इसलिए कुछ काल तक…
  39. Verse 42डसी प्रकार जीने की भी आशा उचित नहीं है, यह बतलाने के लिए उस्रका नदीरूप से वर्णन करते हैं…
  40. Verse 43उसमें यौवन का उल्लास ही कीचड़ भरा पड़ा है, जरारूपी धवल फेन है, काकतालीय के योग से उसमें क…
  41. Verse 44उसमें व्यवहार महाप्रवाह की रेखा है-इस व्यवहाररूप महाप्रवाह की रेखा से उसमें नानाविध मूर्ख…
  42. Verse 45इस जीवन नदी में सदा लोभ-मोह के आवर्त उठते रहते हैं, पतन और उत्पतन से उसका निरन्तर परिवर्त…
  43. Verse 46संसाररूपी नदी के जलस्थानीय जो इष्ट-पुत्र, मित्र आदि के समागम तथा धन हैं, वे पहले के तो चल…
  44. Verse 47इस स्थिति में जो जानेवाले ढै ओर जो आनेवाले हैं; उनके विषय में हर्ष-शोक करना उचित नहीं है,…
  45. Verse 48आयु में धनादि से विलक्षणता बतलाते हैं / संसार में जितनी नदियाँ हैं, उनका जल तो पर्वत, मेघ…
  46. Verse 49इस संसाररूपी सागर में प्रतिदेह और प्रतिक्षण भाव यानी योग्य वस्तुओं का, कुम्हार के चाकपर च…
  47. Verse 50भयंकर शत्रुभूत चतुर विषयरूपी चोर चारों ओर घूमते रहते हैं और विवेकरूपी सर्वस्व का अपहरण कर…
  48. Verse 51आयु के टुकड़े-टुकड़े क्षण क्षण में बार बार गिरते रहते हैं, परन्तु आश्चर्य की बात है कि को…
  49. Verse 52आज यह हुआ, कल यह होगा, यह तो मेरा है और वह इसका है, इस प्रकार रात दिन संकल्प-विकल्प करता…
  50. Verse 53खूब खाया और पीया, अनन्त विभूतियों में विचरण किया, सुखदुःख भी खूब भोगे, अब दूसरा करने को ब…
  51. Verse 54सुख- दुःख के बार-बार के अनुभव से, बार बार अनेक तरह के परिवर्तनां से तथा पदार्थो की नश्वरत…
  52. Verse 55यद्यपि अनेक तरह के अनेक भोग भोगे, बार-बार पदार्थों की अस्थायिता भी देख ली, परन्तु कहींपर…
  53. Verse 56यद्यपि मैंने उत्तुंग शिखरोवाले मेरूपर्वत की उपवन भूमियों मेँ खूब विहार किया तथा लोकपालों…
  54. Verse 57अब सक भोगो की असारता विवेकपूर्वक बतलाते हैं सभी जगह के वृक्ष काष्ठं से ही व्याप्त हैं, प्…
  55. Verse 58न तो धन, न मित्र, न सुख ओर बान्धव ही उस पुरुष की रक्षा कर सकते हैं, जो कि काल के गाल में…
  56. Verse 59बालू के ढेर के सदृश यह पुरुष अत्यन्त अस्थिर है, पर्वतो के मध्य में बरसे हुए मेघ के पेट मे…
  57. Verse 60न तो स्त्रियँ ही अच्छी हैँ ओर न अनेक तरह की भौतिक विभूतियाँ (एश्वर्य) ही रमणीय है यानी बह…
  58. Verse 61हे मुने, अब आप कहिये कि मनुष्य कहाँ, किसका, किस प्रकार और कैसे विश्वास रख सकता है, यानी इ…
  59. Verse 62शरीर तो पत्ते के सदृश गिर जानेवाला है, जीवन की स्थिति भी जीर्णशाली है, बुद्धि अधीरता से न…
  60. Verse 63नीरस विषयों ने ओर उनके मनोरथो ने इस बड़ी आयु को ले लिया, परन्तु चमत्कारजनक यानी उत्तम पुर…
  61. Verse 64आज ही मेरा मोह मन्द पड़ा गया हे, देह यहाँ किसी काम के लिए उपयोगी नहीं है, विषयों मे आसक्त…
  62. Verse 65विवेकी पुरुषों को सम्पत्ति आदि की प्राप्ति में भी निरन्तर यही मानना चाहिए कि यह बड़ी भारी…
  63. Verse 66विवेकी को तो कर्मधा भी व्यामोहकारक ही दीखते हैं; यह कहते हैं। निरन्तर के लिए विधि-प्रतिषे…
  64. Verse 67क्योंकि ऐहिक और आमुष्मिक (पारलॉकिक) विषय कारमियों को ही विवेक से श्रहठ कर अनर्थ की ओर पहु…
  65. Verse 68वास्तव में विषयों का स्वरूप तो असत्‌ ही है, परन्तु भ्रमसे सद्बुद्धि के कारण उसे सद्रूपता…
  66. Verse 69बाह्न इष्टयो को विषयोन्मुखी इष्टि स्वाभाविक हैं, यह कहते हैं जैसे दोनों तटभूमियों पर प्रव…
  67. Verse 70छुटे हुए चित्तरूपी बाण विषयरूप लक्ष्य की ओर ही स्वभावतः जाते हैं, फिर वे विवेक आदि गुणों…
  68. Verse 71आयु तो एक उत्पातवायु ही है, जो मित्र हैं, वे तो स्नेहासक्ति द्वारा ध्वंसक महाशत्रु ही हैं…
  69. Verse 72आसक्ति पैदा करने के कारण सुख अतिदुःखरूप ही हैं, सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ ही हैं, भोग संस…
  70. Verse 73पूर्वोक्त का विवरण करते हुए कहते हैं / सभी सम्पत्तियाँ आपत्तियाँ ही हैं, सुख केवल दुःख के…
  71. Verse 74कालचक्र के प्रभाव से परिवर्तनशील इष्टअनिष्ट प्रसंगों को, विषयों के किंचित्‌ सुख को तथा प्…
  72. Verse 75विषयसेवनरूप भोग तो सर्पों के फण ही समझ लेने चाहिए, क्‍योंकि उनका तनिक ही स्पर्श किया, तो…
  73. Verse 76यह आयु तो आयासशून्य आत्मा की प्राप्ति कराने में सामर्थ्यरहित, भयंकर तथा परिणाम में नष्ट ह…
  74. Verse 77भोगों की अभिलाषा से बद्धतृष्ण जीवों का पद-पदपर ऐसे ही अपमान होता है जैसे कि खानपानरहित, उ…
  75. Verse 78सम्पत्तियाँ तथा ललनाएँ तरगों के उत्संग के सदृश अतिक्षणभंगुर हँ, अतः ऐसा कौन ज्ञानी पुरुष…
  76. Verse 79मान लिया जाय कि विषयभोग मनोरम हैं ओर ऐश्वर्य भी मनोरम ही है, परन्तु जीवन तो उन्मत्त अंगना…
  77. Verse 80विषय तो आपातरमणीय हैं यानी इन्द्रियसंगकाल में ही रम्य भासते हैं, ये परिणाम में अत्यन्त नी…
  78. Verse 81उसके उपायथूत धन में दोष बतलाते हैं / धन इन्द्रों से आक्रान्त हैं यानी उनका उपार्जन करने क…
  79. Verse 82लक्ष्मी ऊपर- ऊपर से ही मधुर है, अन्त में दुःख देनेवाली है, केवल लोक को मोह में डालनेवाली…
  80. Verse 83दुष्टों के साथ किये गये मैत्री आदि सम्बन्ध जैसे आपातरमणीय, थोड़े से संघर्षं मेँ विनाशी, द…
  81. Verse 84यौवन की शोभाएँ शरत्‌काल के मेघ की छाया के सदृश ञजटपट चली जानेवाली (नश्वर) हैं और विषय अवि…
  82. Verse 85चाहे बड़े-से-बड़े ही क्यों न हों, उनके जीव के ऊपर मृत्युरूप अन्त अवश्य उपस्थित हो ही जाये…
  83. Verse 86वृद्धावस्था प्राप्त कर रहे पुरुष के केश तथा दाँत जीर्णशीर्ण हो जाते हँ, जीर्णं अवस्थावाले…
  84. Verse 87अब भोगो को भोग लिया जाय, जन्मान्तर में विवेक, वैराग्य आदि प्राप्त हो जायेंगे, यह सोवा जाय…
  85. Verse 88बाल्य आदि अवस्थाओं में भी विवेकादि की आशा नहीं है, यह कहते हैं / बाल्य अवस्था युवावस्था क…
  86. Verse 89अंजलि से जैसे जल क्षणभर में चला जाता है, वैसे ही यह जीवन क्षणभर में गल जाता है । नदी के प…
  87. Verse 90किसी भी अज्ञात कारण से, अर्जुन वायु के सदुश, यह दुःखदायी देह आई तो है, परन्तु देखते-देखते…
  88. Verse 91हम लोगों को विषयों में नीरसता इसलिए हुई कि रम्य वस्तुओं में अरम्यता ही देखी, स्थिर वस्तुओ…
  89. Verse 92मन के वासनानिर्मुक्त हो जाने पर जो आत्मा में विश्रान्ति प्राप्त होती है, उस विश्रान्ति से…
  90. Verse 93इस समय में दृढ़ वैराग्य से युक्त मुझ पर सम्पूर्णा विषयों को लेकर भी समस्त इन्द्रियों के व…
  91. Verse 94आज दीर्घकाल व्यतीत हो जाने के पश्चात्‌ निरहंकार हुए मैंने अपनी विवेकबुद्धि से यह स्वर्ग-अ…
  92. Verse 95हे मुने, इसी कारण आपकी तरह मैं भी दीर्घकाल तक विश्रान्ति करने के निमित्त इस आकाशस्थान में…
  93. Verse 96महाराज, आपकी यह कुटी है और भविष्य में यहाँ पर आप पधारेगे, यह उस समय मैंने नहीं विचारा । आ…
  94. Verse 97आपने उस्र समय क्या स्रमझा था, इस पर कहते हैं / हे मुने, उस समय तो मैंने अनुमान से यह समझा…
  95. Verse 98हे भगवन्‌, “तुम कहाँ स्थित हो" इत्यादि जितने आपने मुझसे प्रश्न किये थे और मेरी जो खरी हकी…
  96. Verse 99हे मुने, आपके जैसे सिद्ध भी जबतक समाधिनिष्ठ होकर उत्तम बुद्धि से अपने भीतर समस्त वस्तुओं…