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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 99

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 99 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 99

संस्कृत श्लोक

सिद्धैर्न यावदवधानपरैर्विचार्य निर्णीतमुत्तमधियान्तरशेषवस्तु । तावत्त्रिकालकलनं न विदन्ति किंचिदित्यब्जजादिमनसोऽपि मुने स्वभावः ॥ ९९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, आपके जैसे सिद्ध भी जबतक समाधिनिष्ठ होकर उत्तम बुद्धि से अपने भीतर समस्त वस्तुओं का विचार-पूर्वक निर्णय नहीं करते, तब तक वे त्रिकाल के सब वृत्तान्तों का ज्ञान नहीं कर पाते । इसी तरह का ब्रह्मा आदि के मन का भी स्वभाव है, फिर मेरे जैसे पुरुषों की तो बात ही क्या ? इसलिए आपके वृत्तान्त का अपरिज्ञान एवं शरीर को हटाया आदि जो मैने आपके प्रति अपराध किया है, उसे क्षमा कीजिए, यह तात्पर्य निकला