Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
श्लिष्टपक्ष्मेक्षणं क्षीणसर्वेक्षं स्वच्छतां गतम् ।
सरो निमीलिताम्भोजमिव सुप्तं दिनात्यये ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, उनके दोनों नेत्रो की
पलकें बन्द थीं, उनके बाह्य इन्द्रियों के समस्त व्यापार क्षीण हो गये थे और वे अत्यन्त निर्मल हो
गये थे, इसलिए ऐसे भास रहे थे जैसे रात में मुँदे हुए कमलों से युक्त निर्मल तालाब भासता हे