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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्राकाशमेवैतत्सर्वं चिन्मात्रमेव वा । तत्किमत्रासदाकारे रमे नष्टमतिर्यथा ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

ये शब्द आदि जितने विषय हैं, वे यदि स्वतःसत्तावान्‌ चिदात्मा में चिदात्मा से भिन्न माने जायें, तो वे शून्यात्मक यानी असत्‌ ही होगे यदि चिदात्मा से अभिन्न माने जायें, तो चिदात्मा के स्वरूप ही होगे-यों दोनों तरह असद्‌ आकारवाले उन शब्दादि में, उन्मत्त के सदृश, मैं क्यों रमण करूँ ?