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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

मृष्टसौम्यसमाभोगस्कन्धबन्धुरकन्धरम् । सुस्थिरोदारविश्रान्तरकारकस्थितिसुन्दरम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

म कायशिरोग्रीव्म्‌ इत्यादि श्लोक से भगवान्‌ ने जो ध्यान में आवश्यक देहस्थिति बतलाई है, उसके लक्षण कहते हैं / समान (बराबर) विस्तारवाले दोनों कन्धों से, जिनके ऊपर भस्म से त्रिपुण्ड रेखाएँ खिंची थीं, जिनका गाम्भीर्य अत्यन्त ही लुभावना था, उनकी ग्रीवा की शोभा देखते बनती थी । सनातन उदार ब्रह्म वस्तु मेँ उनका मन एकदम विश्रान्ति ले रहा था, इससे उनका मुख प्रसन्न था, इस प्रसन्न वदन से शोभित उनके मस्तक की जो निश्चल स्थिति हुई थी, उससे वे सिद्ध बड़े ही रम्य लग रहे थे