Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
सिद्ध उवाच ।
अधुना त्वं मया ब्रह्मन्परिज्ञातोऽभिवादये ।
अतिक्रमोऽयं क्षन्तव्यः स्वभावो हि सतां क्षमा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
सिद्ध ने कहा : हे ब्रह्मन्, हाँ, अभी मैंने आपको जाना,
अतः आपको मैं अभिवादन करता हूँ । मैंने प्रथम दर्शन में आपको अभिवादन नहीं किया, इससे जो
मेरा अपराध हुआ, उसे क्षमा कीजिये, क्योकि अपराध क्षमा करना सज्जनं का सहज स्वभाव ही
है