Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
विविधाकुलकल्लोला चक्रावर्तविधायिनी ।
मृतिजन्मवृहत्कूला सुखदुःखतरङ्गिणी ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
डसी प्रकार जीने की भी आशा उचित नहीं है, यह बतलाने के लिए उस्रका नदीरूप से
वर्णन करते हैं /
यह जीवन नाम की तो एक महानदी है । इसमें विविध प्रकार के विक्षेप तो ज्वारभाटे हैं, चक्र-
परिवर्तनों के सदृश उसमें नानाविध भ्रमण ही आवर्त है, मरण और जन्म उसके दोनों तरफ के
किनारे हैं तथा सुख-दुःख तरंग हैं