Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
उपविष्ट समाधाननिष्ठमिष्टं पदं गतम् ।
सौम्योदयमिवादित्यं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे सिद्ध समाधिनिष्ठ होकर आसन जमाये हुए थे । उन्होने परम प्रीति का भाजन निरतिशय
आनन्दरूप ब्रह्मपद प्राप्त कर लिया था । वे ऐसे भासमान हो रहे थे जैसे सौम्य उदय से युक्त
आदित्य तथा इन्धन को दग्ध कर चुके अग्निदेव भासमान होते हैं