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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

प्राणापानोर्ध्वगामित्वात्खाद्यथास्थितमेव सः । सृष्टपूर्वोर्ध्वमूर्धोर्व्यां बद्धपद्मासनोऽपतत् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, जब वे आकाश से पृथ्वी पर गिरे, तब वे वैसे ही गिरे जैसे कि आकाश की उत्तम कुटिया में पद्मासन बोधकर स्थित थे । पहले तो उनका पैरका हिस्सा पृथ्वी मेँ जम गया और उनका मस्तक भी ऊँचा ही रहा, क्योकि प्राणवायु से अपने को, ऊपर आकर्षण से, ऊर्ध्वगामी पहले से ही उन्होने कर रक्खा था । तात्पर्य यह है कि जैसे कुएँ में उतर रहा घड़ा या तुम्बा रज्जु से या डंठल से ऊपर की ओर स्तंभित रहता है, वैसे ही वह सिद्ध प्राण ओर अपान से ऊपर की ओर स्तंभित रहने के कारण गिरने पर भी निम्नमरतक नहीं हुए