Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 87
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 87
संस्कृत श्लोक
भोगाभोगातिगहने सर्वस्मिन्कायकानने ।
परमुल्लासमायाति तृष्णैका विषमञ्जरी ॥ ८७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब भोगो को भोग लिया जाय, जन्मान्तर में विवेक, वैराग्य आदि प्राप्त हो जायेंगे, यह सोवा
जाय; तो वह व्यर्थ ही है, क्योंकि जन्मान्तर में विवेकादि ग्राप्त होंगे, यह आशा ही नहीं करनी
चाहिए, यह कहते हैं।
भावी देहों की परम्परारूप शरीररूपी अरण्य में, जो भोगों के विस्तार से अतिगहन हैं, एकमात्र
तृष्णारूपी विषमंजरी ही अत्यन्त लहलहाती नजर में आती है