Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अहं यावदियं तावत्कुटिकास्त्विति कल्पने ।
क्षीणे कुटीक्षये जाते स सिद्धः पतितः क्षणात् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मेरा पहले का संकल्प यह रहा कि यह कुटिया तब तक रहे जब
तक कि मेरी यहाँ स्थिति बनी रहे । यह मेरा सत्य संकल्प जब रप्तर्षिलोक में जाने के संकल्प से
क्षीण हो गया, तब तत्काल ही वह सिद्ध गिर पड़े