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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 52

इक्यावनवाँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग तार्किकं के तर्को से उत्पन्न हुई अनेक प्रकार की कल्पनाओं का खण्डन कर कूटस्थ परमात्मा के अनिवार्च्य जगद्भाव का समर्थन।

45 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, कूटस्थ चिदात्मा जिस क्रम से जगत्‌-सा भासता है, वह क्रम-…
  2. Verse 2धविदात्मा का यह जगत्भाव अगिर्ववनीय ही ह“ इस अपने मत का समर्थन करने के लिए पहले द्रष्टिष्ट…
  3. Verse 3शार ओर अशास्त्र के अनुसार सम्पादित हुई विद्वान ओर अविद्वान की क्रियाओं में भी विलक्षणता द…
  4. Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, इसीलिए आपसे मैं कहता हूँ कि आप भी अपने चित्त की शुद्धि के अनुकूल कर्म…
  5. Verse 5यह दृश्यसमूह की भ्रान्ति ही अविद्या कही जाती है । वास्तव में तो यह अविद्या भी ऐसे नहीं है…
  6. Verse 6जब ऐसी बात हेः तब शारो के उपदेश तथा उनकी फल चिद्धि केसे होगी, इस पर कहते हैं। हे श्रीरामच…
  7. Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, यह अविद्यानामक भ्रान्ति कैसी है ओर कहाँ से आयी-इस तरह के विकल्प न करत…
  8. Verse 8अनुभव में आरुढ़ इस विवर्त पक्ष को दिखनाकर अन्य पक्षों में दोष बतलाने की आधिनाषा कर रहे मह…
  9. Verse 9जिसकी महाराज वस्निष्ठजी ने प्रतिज्ञा की है, उसका अब साधन कहते हैं । विचार कर देखने से यह…
  10. Verse 10ठीक है, नाश हो जाय, क्या दोष हैं, इस पर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी स्थिति में तो…
  11. Verse 11चिदात्मा का अवयव जड़ जयत्‌ न हो, किन्तु मदिरा (शराव) के अवयर्वो में स्थित मदशक्ति की तरह…
  12. Verse 12जग्रत्‌ और व्रह्म का अभेद स्वीकार करने से तो द्ृश्यप्रपंच का नाश होने पर ब्रह्म के नाश की…
  13. Verse 13प्रलयकाल में जयत्‌-रचना के नष्ट हो जाने पर उसके बाद पुनः उत्पन्न हो रही जगत्‌ की शोभा का…
  14. Verse 14यह अनुभव में आरुढ़ नहीं है, इसका स्पष्टीकरण करते हैं / मूर्तरूपा जगत्‌ की शोभा प्रलय में…
  15. Verse 15इस तरह तो सृष्टि में भी प्रलयअवस्था की भी दुल्यन्याय से प्रसक्ति हो सकती हैं / ऐसी स्थिति…
  16. Verse 16जो वस्तु उपलब्ध होकर भी शून्यदशा को प्राप्त हो जाती है वह नष्ट ही है, क्योकि उपलब्धिकाल म…
  17. Verse 17फनः उत्पत्ति के अवलोकन से यदि मध्य में नष्ट हुए की सत्ता की जो कल्पना करते हैं; सो यह ठीक…
  18. Verse 18जेते एक ही वृक्ष के ऊपर बीच-बीच में कोटर स्कन्ध. शाखा आदि का विचित्र भेद रहने पर भी मूल स…
  19. Verse 19द्ष्टान्त में कहे यये कार्यकारणभावोच्छेद को दाष्टान्तिक मे दिखलाते हैं / यदि प्रलय, सृष्ट…
  20. Verse 20(५) अथवा देशात्मक, कालात्मक या क्रियात्मक तत्‌-तत्‌ पदार्थो मेँ अनुगत बीज को एक स्वभाव ही…
  21. Verse 21परिशेषात्‌ वस्तु एक स्वभाव हैं, यह मान लेने पर तो उपजीव्य एक वित्स्वभाव का ही शेष रह जाता…
  22. Verse 22अब एक स्वभाव उल परमात्मवस्तु के प्रतिपादन की प्रतिज्ञा करते हैं यह परमात्मस्वरूप जिस रीति…
  23. Verses 23–26एकमात्र यही कारण है कि महाकल्प के अन्त में समस्त भेदों का लय हो जाने पर लय को प्राप्त न ह…
  24. Verse 27वह परमपद वाणी का अविषय, अनभिव्यक्त, इन्द्रियों का अविषय, नामरूप शून्य, सर्वभूतस्वरूप, शून…
  25. Verse 28महाकल्प के अन्त में अवशिष्ट वह सद्रूप परमात्म वस्तु कायु आदि स्वरूप ही कर्यो न हो, इस पर…
  26. Verse 29उत समय भी वह विद्वानों के अनुभव से प्रिद्ध हैं, यह कहते हैं । उस परमपद में स्थित समस्त कल…
  27. Verse 30उन आगमो में काल: स्वश्रावो नियतिर्य्च्छा श्रुतानि योनिः पुरुष इति चिन्तयम्‌“ इत्यादि आगरम…
  28. Verses 31–32एवं (तद्यथात्विदो विदुः“ इस आगरम को भी उद्धृत करते हैं / किन्तु बोधपारंगत, संसारविस्तार स…
  29. Verse 33श्चति के अनुकूल अनुभव का आश्रय करके मेने भी उन पदार्थों का बार-बार निषेध किया हैं, यह कहत…
  30. Verse 34इस्रीलिए निह नानास्ति किंचन' इत्यादि तथा सदेव सोम्यदमग्र आसीत्‌ इत्यादि श्रुतियों के अविर…
  31. Verse 35पत्थर में न खुदी गई नाना प्रकार की प्रतिमाओं की तरह योगियों को अपनी इच्छा के अनुसार स्वस्…
  32. Verse 36उस आद्य पद को योगी लोग सर्वरूप, सर्वात्मक, सम्पूर्ण अर्थो से रहित तथा सम्पूर्णं अर्थो से…
  33. Verse 37हे महाबुद्धे, पूर्वोक्त समाधिकालपर्यन्त सम्पूर्णं अर्थो का उपशमरूप वह सम्यग्‌ ज्ञान आपको…
  34. Verse 38जो ज्ञानी पुरुष सब दृश्यों के आभास से निर्मुक्त, परम प्रकाशरूप को (परम साक्षात्कार को) प्…
  35. Verse 39जैसे सुवर्णपिण्ड के भीतर आभूषण तथा मुद्रा आदि का समूह कल्पना से स्थित है, वैसे ही हे श्री…
  36. Verse 40तब क्या अलंकारों की तरह भेद से भी जग्रत्‌ सत्‌ है 2 इसका नही" यह उत्तर देते हैं / हे श्री…
  37. Verse 41अपने अंगरूप जगत्‌ से द्रष्टा परमात्मा मिथ्या नाम- रूपात्मक द्वैत जगत्‌ से सर्वदा ऐसे भिन्…
  38. Verse 42देश, काल क्रिया आदि शब्दों के अर्थो से यानी प्रवृत्ति निमित्त से (जाति गुण क्रिया आदि से)…
  39. Verse 43जैसे चित्रकार शान्त जल में तरंग आदि रूप चित्र बनाने की इच्छा करता हे वैसे ही हे श्रीरामचन…
  40. Verse 44हे श्रीरामचन्द्रजी, मिटटी के पिण्ड मेँ जैसे अभिन्नरूप से ये सब पात्र हैं और भिन्नरूप से न…
  41. Verse 45महास्तम्भ में अनुत्कीर्णं प्रतिमा की नाई, ब्रह्मरूपी काठ में यह त्रिलोकी रूप प्रतिमा साक्…
  42. Verse 46स्तम्भ में स्थित जो प्रतिमाएँ उत्कीर्ण होती हैं वे ही दृष्टिगोचर होती हैं किन्तु ब्रह्म म…
  43. Verse 47नित्य निरतिशयानंद जलपरिपूर्णं चितिरूपी सरोवर में चिन्मय मेघ की अमृतमय वृष्टि के सदृश ये स…
  44. Verse 48है ओर वास्तव में कुछ भी नहीं भासता
  45. Verse 49हे श्रीरामचन्द्रजी, निरवयव इस परमात्मा के जिस आकाश, काल, पवन आदिपदार्थ समूहरूप अंग का मैं…