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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

मध्ये मध्ये यदुत्सेधफलाद्यवयवैकिका । आदेहं बीजसत्तास्ति कार्यकारणता कुतः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जेते एक ही वृक्ष के ऊपर बीच-बीच में कोटर स्कन्ध. शाखा आदि का विचित्र भेद रहने पर भी मूल से लेकर शाखापर्यन्त वृक्ष शरीर की तो स्ता एक ही हैं / ह शाखा आदि उस वृक्ष के कार्य हैं उनमें भेद अवश्य है, वैसे ही उत्पत्ति आदि विकार्यो का भेद होने पर भी प्रलय के बाद पुनः उत्पन्न होने से इस दृृश्यप्रपंच की भी सत्ता एक ही क्यों न हो, इस शका पर कहते हैं / वृक्ष के बीच-बीच में स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प तथा फलादिरूप जो अवयव हैं उनमें सारे वृक्षरूपी शरीर को व्याप्त करके स्थित बीजसत्ता अखण्ड एकरूप ही है अतः जब सर्वत्र एक ही सत्ता दृष्टिगोचर हो रही है तब शाखा आदि की पृथक्‌ सत्ता सिद्ध न होने से कार्यकारण भाव कैसे हो सकता है ?