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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

तन्न वायुर्न चाकाशं न बुद्ध्यादि न शून्यकम् । न किंचिदपि सर्वात्म किमप्यन्यत्परं नभः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

महाकल्प के अन्त में अवशिष्ट वह सद्रूप परमात्म वस्तु कायु आदि स्वरूप ही कर्यो न हो, इस पर कहते हैं / सद्रूप वह परमात्मवस्तु न वायुरूप है, न आकाशरूप है, न मन, बुद्धि आदिरूप है, न शून्यरूप है, वह कुछ भी नहीं है, सर्वस्वरूप वह अनिवर्चनीय चिदाकाश है