Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं स्थिताः सर्वे भावास्तत्र यथा तथा ।
अनुत्कीर्णा महास्तम्भे विविधाः शालभञ्जिकाः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्चति के अनुकूल अनुभव का आश्रय करके मेने भी उन पदार्थों का बार-बार निषेध किया हैं,
यह कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, मैने आत्मबोध के लिए आपसे उन्हीं पदार्थों का निषेध किया है, जो सर्वत्र
श्रुतियों में प्रतिषेध्यरूप से स्थित, हमारी बुद्धि से परिच्छिन्न एवं शान्त समुद्र के तरंगों के सदृश हैं ॥३ २॥
तब “सदेव स्रोग्येदमग्र आसीत्“ इत्यादि सत्कार्यवादी श्रुतियों का क्या अभिप्राय है, उसे
कहते हैं।
जैसे महास्तम्भ में (बड़े खम्भे में) बिना खुदी हुई अनेक तरह की प्रतिमा ही स्थित है वैसे ही
हे श्रीरामचन्द्रजी, स्वस्वरूप में स्थित परमात्मा में सभी पदार्थ स्थित हैं (७)