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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । वृक्षस्येव विमूढस्य यद्दृष्टौ तत्स्वचेतसि । यन्न दृष्टौ न तच्चित्ते भवत्यल्पतरस्मृते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

धविदात्मा का यह जगत्भाव अगिर्ववनीय ही ह“ इस अपने मत का समर्थन करने के लिए पहले द्रष्टिष्टिपक्ष का अवलम्कन करके दष्टि के अन्वय और व्यतिरेक के अनुसार उम्रकी स्थिति दिखलाते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, शाखा, पत्र, पुष्प, पल्लव आदि नाना प्रकार के आकारोंसे युक्त वृक्ष के समान अज्ञ आत्मा की दृष्टि में जो जगद्भाव है वही उसके चित्त में भी है और जो उसकी दृष्टि में नहीं है वह उसके चित्त में भी नहीं है यही कारण है कि देखी गई अत्यन्त छोटी वस्तु का भी स्मरण होता है किन्तु न देखी हुई बड़ी वस्तु का भी स्मरण नहीं होता