Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नष्टं भूयस्तदुत्पन्नमिति यत्प्रत्ययेति कः ।
नश्यत्यवश्यं तेनेदं पुनरन्यत्प्रवर्तते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
फनः उत्पत्ति के अवलोकन से यदि मध्य में नष्ट हुए की सत्ता की जो कल्पना करते हैं; सो यह
ठीक नहीं हैं, क्योकि भेद से भी तो उत्पत्ति की सिद्धि हो जाती है और ग्रत्यथिज्ञा आदि का भी तो
अवलोकन नहीं होता, यह कहते हैं ।
जो नष्ट हुआ है वही पुनः उत्पन्न हुआ है, यह प्रत्यभिज्ञा किसको होती है, इसलिए नष्ट
अवश्य होता है तथा पुनः पुनः दूसरा ही प्रवृत्त होता है यही कहना उचित होगा