Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
तथैतदत्र नो भिन्नं नाभिन्नं नास्ति चास्ति च ।
नित्यं तन्मयमेवाच्छं शान्ते शान्तमिदं तथा ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, मिटटी के पिण्ड मेँ जैसे अभिन्नरूप से ये सब पात्र हैं और भिन्नरूप से
नहीं भी हैं, वैसे ही तत्त्वज्ञान से शान्त, नित्य आत्मा में तन्मय शान्त यह जगत अभिन्नरूप
से है और भिन्नरूप से नहीं भी है