Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
न कालो न मनो नात्मा न सन्नासन्न देशदिक् ।
न मध्यमेतयोर्नान्तं न बोधो नाप्यबोधितम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उन आगमो में काल: स्वश्रावो नियतिर्य्च्छा श्रुतानि योनिः पुरुष इति चिन्तयम्“ इत्यादि
आगरम का अर्थरुप से अवलोकन कराते हैं /
यह आत्मा न काल है, न मन है, न जीव है, न सत् है, न असत् है, न देश है, न दिशा है और
न काल का मध्य है, न अन्त है, न बोधस्वरूप है और न बोधाभावरूप ही है