Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सैवैतीत्यसमुल्लेखं कथं नष्टस्य संभवः ।
तद्रूपान्येति युक्तं स्यादनुभूतानुगा वयम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रलयकाल में जयत्-रचना के नष्ट हो जाने पर उसके बाद पुनः उत्पन्न हो रही जगत् की
शोभा का यह कभी निश्चय नहीं किया जा सकता कि यह वही हैं या दूसरी, इस तरह भी इसमें
अनिर्ववनीयता ही चिद होती हैं, यह कहते हैं /
इस सृष्टि से पहले संसार की शोभा नष्ट हो चुकी थी, वही पुनः आविर्भूत हो रही है, इसका
उल्लेख करना अशक्य है । हाँ, यदि वही पुनः आविर्भूत होती, तो वही यह है या अन्य, यह कहा
जा सकता था, किन्तु नष्ट की उत्पत्ति केवल अनुभव के अनुगामी हम अनुभवविरुद्ध अणुमात्र भी
नहीं मान सकते, क्योंकि नष्ट की उत्पत्ति हो कैसे सकती है ?