Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
यथोर्म्यादि समे तोये चित्रं चित्रकृदीहते ।
भाण्डवृन्दं मृदः पिण्डे तथेदं ब्रह्मणि स्थितम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चित्रकार शान्त जल
में तरंग आदि रूप चित्र बनाने की इच्छा करता हे वैसे ही हे श्रीरामचन्द्रजी, शान्तब्रह्य में स्थित
इस जगत् की आप भी इच्छा कीजिये । तथा जैसे मिट्टी के पिण्ड में मिट्टी के बने अनेक पात्रों
का समूह स्थित है वैसे ही ब्रह्म मेँ यह जगत् स्थित है