Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सैव व्योमतयैवासीदित्यसत्सैव सा कथम् ।
तथैव व्योमसंस्था चेन्नाशं तर्हि न सा गता ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अनुभव में आरुढ़ नहीं है, इसका स्पष्टीकरण करते हैं /
मूर्तरूपा जगत् की शोभा प्रलय में आकाशरूपी से -अमूर्तरूप से ही विद्यमान थी, यह कहना
बिलकुल असत् है, क्योंकि जो मूर्तरूप ही थी, वह भला अमूर्तरूप कैसे हो सकती है ? यदि यह
कहिये कि आकाश में स्थित ही वह अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त हुई, तो आपसे हमें यही कहना
पड़ेगा कि वह फिर प्रलय में भी नष्ट नहीं हुई । कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह आपका
प्रलयवाद उच्छिन्न हो गया